कविता : जीवन के रंग - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 26 जनवरी 2026

कविता : जीवन के रंग

खुद को न माना किसी से कम,

दुनिया के एक कोने में हैं हम,

न डर है न कोई शर्म,

लिखना तो मैं बहुत कुछ चाहूं,

पर लिख न पाऊँ मैं सच,

अरे फिक्र भी तो हैं सबकी,

चाहे छोड़ना पड़ जाए दम,

दुनिया से अनजान रहकर भी,

जुड़े हैं उन मधुर गीतों के संग,

उसे मैं चहचहाना कहूँ,

या कहूँ कुछ और,

या चलती रहे उन हवाओं के संग,

जिसने पकड़ा है हर छोर एक रंग,

लिखती हूं उस जल की धारा में

जो है निर्मल और सब रंग।।





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श्रुति जोशी

बैसानी, उत्तराखंड

गांव की आवाज 














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